Sunday, July 17, 2011

ख्वाबों का पेड़

बहुत  मशहूर  हुए  हम
तुम्हारे  नाम  क़े  कारण !
आज तुम्ही ने मुख मोड़ा
क्यों कर लिया मौन धारण !!

ख्वाबों का पेड़ मुरझा गया
वीरान  हो  गई हर  डाली !
बीते हुए अतीत की आखिर
कब तक करू मै रखवाली !!

वेदनाओं का पिटारा अब
मेरा अपना मीत बन गया !
सो नैया को मैंने स्वयं ही
तूफान की ओर मोड़ दिया !!

तन्हाई में, पवन में
मेरा दर्द है  लहराता !
मै तो बस अन्दर ही
घुट  कर  रह  जाता !!

अम्बर को  या  धरती को

किसे अपनी व्यथा सुनाये !
जब  तार ही  टूट  गया
मोती हम कैसे पिरोये !!

10 comments:

  1. बहुत बढ़िया सर.
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    कल 19/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. अम्बर को या धरती को
    किसे अपनी व्यथा सुनाये !
    जब तार ही टूट गया
    मोती हम कैसे पिरोये !!

    बहुत बढ़िया सर....सादर...

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  3. मन कि व्यथा को चित्रित करती सुन्दर रचना

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  4. जब तार ही टूट गया
    मोती हम कैसे पिरोये !! bahut achchi lagi......

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  5. वाह भाईजान ख़्वाबों का पेढ और उसकी व्यथा खूब बयान की है ..बधाई हो .अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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  6. आप सबका तहे दिल से आभारी हूँ...! भविष्य में भी इसी तरह के सहयोग की कामना करता हूँ ...!!

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  7. तुम क्या गए, जिंदगी चली गयी,
    जमीं मुझ पर हंस पड़ी,
    अम्बर भी रो दिया.
    पर न तुम आये,
    न तुम्हारे आने की आस ही आई.

    दिनेश जी,
    बहुत ही संवेदनशील कविता. भावाभिव्यक्ति में पूर्ण सफल.

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  8. कमाल का लेखन है, चंद लफ्जों में कितनी बडी बात कह दी है आपने

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  9. जाने कैसी आह वेदना कि
    अब पुनः उर में उपजती है
    इस निर्जन अटवि में क्यूँ
    स्मृतियों कि रागिनी बजती है

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