Monday, December 5, 2011

ये जिंदगी......!!!


रोज जीता रहा......
रोज मरता रहा.... 
जिंदगी यूँ ही गुजारता रहा !
नई जिंदगी होती, हर दिन मेरी !
हर रात होती, फिर मौत मेरी !!
मर कर रोज, मै फिर जीता रहा !!

जिंदगी मेरी, ऐसे ही शान से बढती रही !
कि, मौत भी आने पास कतराती रही !!

नहीं है जिंदगी मेरी, कुछ ऐसी सस्ती !!
बनाई है उसने भी, दुनिया में कुछ हस्ती !!

मेरे बिना कल तुम्ही को पछताना पड़ेगा !
एक बार फिर मेरे पास लौट आना पड़ेगा !!

सुबह-सुबह खुले जब ये मेरी पलकें !
बीती बातों पर कभी ना ये है छलकें !!

जो बीत गया, उसे अब क्या याद रखना !
आगे अभी भी, बहुत कुछ काम है करना !!

Sunday, November 6, 2011

ये बेबसी.....!!


मै तो मज़बूरी में आया था
गाँव से शहर की ओर !!
पढ़ लिख कर तुमने क्यों किया,
देश को ही एक ओर !!

गिरवी रखकर आया था यहाँ,
मै अपना मान और सम्मान !
सपनों में आज भी दिखते वही
उजड़े खेत और खलिहान !!

क्या तुम भी थे मेरी ही तरह
कुछ इस तरह बेबस मजबूर !
या सिक्को की खनखनाहट ने
कर दिया तुम्हे सबसे दूर !!

शहर में रहते हुए भी आज 
याद आते है मुझे, गाँव क़े वे गलियारे !
क्या तुम्हे भी याद आते कभी,
अपने निकट सम्बन्धी और प्यारे !!

कहने को तो आज ही सब छोड़
मै वापस भी चला जाउँगा !
पहले भी तो कुछ ना था
अब भी शायद कुछ ना मिल पाए ! 

मेरी जरुरत आज गाँव में 
भले किसी को हो या ना हो 
गर तुम वापस आ जायो,
शायद यह देश फिर से निखर जाए !!

Sunday, October 30, 2011

The positivity within is reflected in sweetness in the words.


Things do not always go the way we want them to.If we allow ourselves to get influenced by the situation, it is reflected in our words, which tend to become bitter. But if we are able to maintain our positivity even in negative situations, there will be sweetness in our words. 
When we have faced with a difficult situation, our effort should be to maintain the positivity in our mind. 
For this we must remind ourselves that each and every moment is worth a lot, which we must be able to enjoy. We must have the joy of being alive and happy. When we will be able to do this, there will be sweetness in our words. 

Sunday, October 23, 2011

दीपावली......!!


कहते है
दीवाली आती है
लक्ष्मी भी साथ लाती है !
सच तो यह है कि
लाती नहीं, ले जाती है !
यह नहीं कहता कि
दीवाली न मनाओ !
लेकिन व्यर्थ ही में
मुद्रा यूँ न गवाओं !
उन्हीं का कर योग
तुम करो विनियोग
कुछ करों क्रय
बनो सक्रिय
ताकि कह सको कि
यह दीपावली की भेंट है !
वरना, तुम्हारा तो
बस मटियामेट है .....!!

Saturday, October 1, 2011

चेहरा...............!!












रहता हूँ खड़ा जब भी
मै आईने क़े सामने
दिखता रहता है, एक चेहरा
कुछ अन्जाना सा
कुछ जाना पहचाना सा !!
सोचता हूँ, क्या यहीं है वो
करता रहता हूँ, जिसके लिए
हर गुनाह मै बारम्बार !
और करता रहूँगा लगातार !!
 कौंधती है, बिजली-सी
ना जाने क्यों ये चेहरा
नया सा  लागे हर बार !!
क्यों बदल जाये केवल
मेरा ही अपना चेहरा
करता हूँ गुनाह जिन चेहरों क़े लिए
नहीं बदलते सिर्फ वही चेहरे......!!

Sunday, September 25, 2011

क्यों मै सोचूँ,...?

क्यों मै सोचूँ, वह नहीं है मेरा अपना !
अपना सपना भी होता है केवल अपना !!
जो भी है, जितने भी है, सब मेरे अपने है !
कुछ हकीकत में है, बाकी मेरे सपने में है !!
परवाह नहीं गर, भटकता रहे मेरा  तन !
नियंत्रण में तो रहता है हमेशा मेरा मन !!
चाह नहीं मुझे कि कोई कहें मुझे अपना प्यारा !
मै तो मन ही मन ना जाने कब-कब क्या हारा !!
 

Sunday, July 17, 2011

ख्वाबों का पेड़

बहुत  मशहूर  हुए  हम
तुम्हारे  नाम  क़े  कारण !
आज तुम्ही ने मुख मोड़ा
क्यों कर लिया मौन धारण !!

ख्वाबों का पेड़ मुरझा गया
वीरान  हो  गई हर  डाली !
बीते हुए अतीत की आखिर
कब तक करू मै रखवाली !!

वेदनाओं का पिटारा अब
मेरा अपना मीत बन गया !
सो नैया को मैंने स्वयं ही
तूफान की ओर मोड़ दिया !!

तन्हाई में, पवन में
मेरा दर्द है  लहराता !
मै तो बस अन्दर ही
घुट  कर  रह  जाता !!

अम्बर को  या  धरती को

किसे अपनी व्यथा सुनाये !
जब  तार ही  टूट  गया
मोती हम कैसे पिरोये !!

Saturday, July 2, 2011

दायरा समय का.....!!

समझाया करती थी माँ बचपन में लाख !
बेटा, वक़्त रहते  बना ले तू अपनी साख !!

पर,कही हुई बातें सिर पर से गुजर जाती !
काश, वो बातें तब ही समझ में आ पाती !!

बनकर बाप, आज जब बच्चे को समझाता ! 
बार-बार माँ का ही चेहरा सामने आ जाता !!

काश, माँ तेरी कही बातें वक़्त रहते समझ जाता !
आज फिर क्यों इस तरह अपने दिल को तडफाता !!

जिसकी गुजरनी थी जैसी, उसकी तो वैसी गुजर गई !
सोच लो मेरे भैय्या, तुम्हारी है अभी बारी नई-नई !!

Sunday, May 8, 2011

भूल जा ........!!


जानती हूँ मै,
मानती हूँ मै ,
तू भी आज तड़पता होगा !
हर दिन से ज्यादा,
आज और कलपता होगा !!
देता होगा मुझे तू.. सौ सौ गालियाँ,
औरो की तरह ही कोसता होगा !!

बरसो मैंने भी छानी है खाक,
हर कचरे क़े ढेर में...
दिखाई देते थे केवल अपने ही पाप
दिखता केवल तुम्हारा ही चेहरा
लेकिन क्या मै पापिन थी,
कौन कर पाया आज तक
फैसला किसी क़े भी हक़ में  !
दुनिया का क्या है,
वह तो कहती रहती है,
कुछ होने पर \
कुछ न होने पर भी !!

देना चाहती थी,
प्यार-दुलार मै भी
बन कर एक सम्पूर्ण माँ ...
नियति ही शायद ख़राब थी
या फिर दोष केवल मेरी किस्मत का !!

(मातृ दिवस क़े अवसर पर एक माँ का निवेदन .....!)

Saturday, May 7, 2011

लो आ गई उनकी याद .....!!

बात है यह कम से कम कोई तीस वर्ष पुरानी !
हकीकत बन गई है आज, केवल एक कहानी !!

पहले रातो को मद-मस्त होकर जब  घर आता !
सब अपना लगता, डर नहीं था बिलकुल समाता !!

माँ खोलती दरवाजा आहिस्ते - आहिस्ते !
जाग ना जाये कही पिताजी क़े फरिस्ते !!

माँ ने नहीं कहा कभी भी हमसे एक भी बात !
दिनचर्या चलती रहती ठीक, दिन हो या रात !!

हम समझते रहे ख़ुद को बहुत ही  होशियार और लायक !
माँ ने भी आज तक कभी नहीं पुकारा कह कर नालायक !!

विवाहोपरांत जब पहली बार हुए हम फिर मद-मस्त !
पत्नी ने कर दिए हमारे सारे हौसले बुरी तरह से पस्त  !!

तब जाकर समझ में आया, माँ केवल माँ होती है !
रोते तो सब है दुनिया में, दिल से केवल  माँ रोती है !!

Saturday, April 30, 2011

मै श्रमिक हूँ .....!!

जी हाँ ...मै श्रमिक हूँ
एक खानदानी श्रमिक !
श्रम करता जाता हूँ ...
अन्न-वस्त्र, मकान देता जाता हूँ
मेरा क्या है...
मेरी तो य़ू ही गुजर जाती है
लेकिन मेरे बाद क्या होगा..?
चिंता ना करे,
आ रहा है.. मेरा बेटा !!

( औरो क़े श्रम का उपभोग कर रहे....
......उनके लिए श्रमिक दिवस मना रहे !! )

Monday, April 11, 2011

आजादी.....


अपने आप पर, 
अपने आप क़े द्वारा 
लगाया गया बंधन !
किन्तु सभी में है, 
"स्व " की जकड़न !!

सिर्फ हमारी परम्पराओ, 
का है ये जायफल !
अथवा 
दीर्घकालीन संस्कारो 
से मिला हुआ फल !

नहीं जानता क्या मेरे पास, 
आया जब इस संसार में !
ये दिल, ये दिमाग, 
ये स्वभाव, ये अभाव
शायद आते गए, 
समय क़े साथ-साथ 
या फिर अपने-आप !!

हम/हमारा मस्तिष्क 
भारतीय दिमाग 
भूत से/वर्तमान तक 
अभी भी /आज तक 
अनधीनता का न कर विचार 
स्वाधीनता का रूप करता स्वीकार 

क्या हम कभी इस 
बंधन को तोड़ सकेंगे 
अथवा अपने ही आधीन 
रहते रहेंगे.....!!

Saturday, March 26, 2011

अब हमारी बारी है....!!


लोगो ने पाल रखी है,
एक गलतफहमी...! 
न जाने क्यों बनता,
है हमसे इतना रहमी !! 
कहते है वो कि,
बुढ़ापा होता है बड़ा ही दर्दनाक !
सोच लो पहले.. जरा अच्छे से ,
हमारे जैसा नहीं कोई खतरनाक !!
अरे मजाल है किसी की,
जो करे हमारी नाक में दम !
बाजुओ का दम हुआ कम 
तो क्या हुआ, नहीं कोई गम !!
बालो को रंगते हुए आखिर,
हमने उड़ा ही दिया बालो को !
य़ू ही नहीं लैन में लगाया,
इतने सारे घर वालो को !!
अरे यारो, जरा रुकिए...
सोचिये, बुढ़ापे का वो आराम !
न कोई धंदा, न कोई काम
सब कामो से कर क़े राम राम !!
जिंदगी भर की गई, 
नामुराद दौड़ धुप से राहत !
नहीं रह जाती बाकी,
अब किसी और की चाहत !!
बुढ़ापा तो होता है आपके, 
जीवन का सुनहरा चौका !
और अपनी जिंदगी 
ख़ुद क़े लिए जीने का 
एक सुनहरा मौका......!!

Sunday, March 20, 2011

एक मोड़ ऐसा भी.....!!


जीवन भर चलता रहा मै, लेकर पुरे परिवार का रेला !
उम्र क़े अंतिम पड़ाव पर, बैठा रहता ताकता अकेला !!

बजाई थी बड़ी शान से जिनके पैदा होने पर थाली !
वही आज हमें बजाते दे -देकर जोर जोर से गाली !!

कहते है सब भुगत कर जाना पड़े, नहीं कही स्वर्ग और नर्क !
जीवन की गोधुली बेला में न जाने, क्यों हो जाय बेडा गर्क !!

गुजर जाती है उम्र सारी, नहीं गुजरती अब अंतिम बेला !
आँखे भी थक चुकी अब, देख जीवन का ये खेल अलबेला !!

बचपन से सुनते आए, वही काटोगे जैसा था तुमने बोया ! 
पिता क़े थे हम श्रवण-कुमार, देख अपनी  दिल है रोया !!

Thursday, March 17, 2011

एक चिंतन....


भेड़ और बकरिया
कभी कुछ नहीं बोलती, 
मिमयाने क़े अलावा
दूसरा कोई शब्द नहीं बोलती 
क्या उन्हें सत्यवादी मान लेना चाहिए.....?
भोले-भाले हिरण
कभी हिंसा नहीं करते, 
बल्कि आहट सुनकर 
कोंसो दूर भाग जाते है 
क्या उन्हें परम दयालु मान लेना चाहिए...?
कोई अँधा, बहरा, मूक और विकल शरीर 
मनुष्य जंगल में जीवन काटता हुआ 
न अशुभ सुनता है,
न अशुभ बोलता है,
न अशुभ करता है !
क्या हमें उसे मुनि मान लेना चाहिए ....?
उन्मत्त अथवा मूर्छित मनुष्य
अशुभ संकल्प-विकल्प से शून्य होता है, 
क्या हमें उसे महात्मा मान लेना चाहिए...? 
कुछ न करना हमारा धर्म नहीं, 
बल्कि क्रियात्मक है धर्म तो  ! 
किसी का दया पात्र बनने क़े बजाय
हमें अपने कंधे हमेशा मजबूत 
रखने का प्रयास करना ही है सर्वोपरि ! 

Wednesday, March 9, 2011

हम वो है....!!



काश यह धरती होती कागज, और समुन्दर में भरे होते रंग 
तो इस दुनिया को न जाने कब का रंगीन बना डालते हम !!

वे तस्वीर सिरहाने रखकर कमरे की बत्तिया जलाते-बुझाते,
और लाइट बंद करके आराम से पूरी रात चैन से सोते हम !!

वे पुराने फटे प्रेम-पत्रों को फिर से बार-बार  चिपकाते,
और उनके लिखे पत्रों को बिना पढ़े फाड़ते रहते हम !!

वे खिड़की से फेंके हुए जुल्फों क़े लच्छे संवारते,
और नकली बाल हाथ में लिए फेंकते रहते हम !! 

वे बैठे-बैठे चमकती रेल की पटरी रहते  देखते, 
और ट्रेन में बैठकर कही दूर निकल जाते हम !!

लिए हाथ में फूटी चूड़ी का टुकड़ा रहे वे  निहारते,
खबर भी ना होने पाई कब कंगन पहना गए हम !! 

वे इसी तरह पूरी जिन्दगी, य़ू ही  रहे गुजारते, 
सोच भी न पाए, कब पूरी जिंदगी गुजार गए हम !!

Tuesday, March 1, 2011

मेरा देश महान....!!




अभी- अभी उडती हुई एक ताजा खबर आ रही है !
सरकार, अब आंसुओ पर टैक्स लगाने जा रही है !!

अब हमें ,एक-एक आंसू का हिसाब रखना होगा !
जितना रोयोगे, उतना ज्यादा टैक्स भरना होगा !!

वाह री दुनिया..... वाह मेरे नायब मुल्क ...!
दिल में रोने पर भी लगा दे उत्पादन-शुल्क !!

साँसे लेने पर, आँहे भरने पर भी " कर " चुकाना होगा !
इस देश में पैदा होने का तो फ़र्ज़ आखिर निभाना होगा !! 

थक गया इन्सान अब जा जाकर मंदिरों में !
लेकिन महगाई को ना बांध पाया जंजीरों में !!

ना हँस सके हम, न रो सके हम !
तुम्ही बताओ, अब क्या करे हम !!

Saturday, February 26, 2011

वक़्त .....?



क्यों रखे हम किसी से उम्मीद इतनी,
कि ना-उम्मीदी का सामना करना पड़े !

दो ही हाथ काफी है हमारे अपने...
वक़्त से जब-जब हमें  य़ू लड़ना पड़े !!

वक़्त पर क्यों करे गर हम एतबार 
क्या वही सुख की आयु है बढाता !

वक़्त ही सब कुछ क्या समय क़े साथ 
जो हमारे दुःख की उमर है घटाता !!

वक़्त कभी भी होता नहीं बुरा  
उसे बुरा वक़्त हम ख़ुद बनाते है !

अपने ही गलती को छुपाते हुए 
अपने-आप को ही य़ू बहलाते है !!

वक़्त नहीं है कभी किसी से ऐसे कतराता !
किसी को आता देख,राह नहीं छोड़ जाता !!

वक़्त पर क्यों कर रहे तुम   इतना एतबार !
क्या पता कल ये करने लगे हमसे ही प्यार !! 

जीवन-यात्रा....!!



क्यों जमाने ने अपनाया,
क्यों मेरे अपनों  ने ठुकराया !

क्या खोया और क्या पाया,
आज तक समझ न आया !!

डूब गया था  इस कदर,ज़माने की उलझनों में ....
न जाने पानी कब सिर से उपर मैंने  पार पाया  !!!

अपनों ने दिखाने क़े लिए तो फूल दिए,
नजर पलटते ही अंगूठा दिखाया !

गैरो ने भले दिए हो कांटे अनेक , 
जरुरत पड़ने पर गले लगाया !! 

दुश्मन भी दोस्त बन जाते है अब यहाँ 
अपने ना जाने क्यों आँखे दिखलाते है !

दुश्मन की दुश्मनी की भी होती है एक हद,
अपने क्यों सभी हद पार कर जाते है !! 

अब भी क्यों धड़क रहा है ये नादाने दिल, 
साँसों का चलना अब एक बहाना बन गया !

दर्द उगलता जा  रहा हूँ आज अपने मन का,
गीत मै कोई पुराना, आज एक तराना बन गया  !!

थक-सा गया हूँ,आराम भी जरुरी है...
एक लम्बी जीवन-यात्रा  क़े बाद !!

Saturday, February 19, 2011

जीवन-क्रम


बचपन में देखा करता था 
गाँव में पैसे भेजता हुआ पिता ! 
मजाल है कि एक भी महीना, 
कभी गया हो इससे रीता !!
हर माह पहली तारीख को 
बंधा हुआ एक निश्चित क्रम !
जो कभी टूट न पाया 
बाबा क़े जीवन पर्यंत !

सोचा  करता था,
पैंट मेरी कब से है फटी हुई 
माँ करती रहती है पैबंद उसे 
इन्हे तो मेरी कोई चिंता ही नहीं 
बेटे से बड़ा हो गया पिता उन्हें !

आज मै भी करता रहता हूँ, 
हर पहली तारीख का इंतजार !
जो  इसी तरह निकल जाती है 
रीती हुई बार बार !!
आज मै बड़ा नहीं हूँ, 
क्यों कि मेरे बेटे को 
चिंता है ज्यादा मुझसे,
मेरे अपने पोते क़ी....!

Sunday, February 13, 2011

पहचान...?

क्या है तुम्हारी आज पहचान !
सारी दुनिया है तुमसे अन्जान !!
आज तुम पहचाने जाते हो....
केवल तुम्हारे अपने पिता क़े नाम से !
कुछ ऐसा कर जाओ कमाल कि,
पिता पहचाना जाये तुम्हारे नाम से !!
आज तो तुम नित नए दिन मनाते फिरते हो !
न जाने कब कहा उठते और कब गिरते हो !!
कितने भी दिन मना लो
आज ये दिन, कल फिर वो दिन !
नहीं मना पाओगे
३६५ से ज्यादा दिन !!
कभी इसके बिन...
कभी उसके बिन !!

Tuesday, February 8, 2011

रियल लव

हमने पूछा -
गुरु, लव का मायने तो समझ गए !
लेकिन रियल लव में आकर उलझ गए !!
गुरु बोले-

मूर्ख, तू कितना नादान है !
छोटी बातो से अन्जान है !
अरे, हमने ही तो रियल लव बनाया है
लोगो को य़ू ही भरमाया है
यहाँ दिखता तो सब रियल है
पर ये रियल नहीं रील है
यहाँ आकर बन जाओ, तुम भी  कृष्णा !
और मिटा लो अपनी मृगतृष्णा !   

Wednesday, February 2, 2011


रेल..पलों की !
पलों की एक लम्बी-सी  रेल 
रोज  गुजरती है मेरे सामने से !
मै बैठा-बैठा गिनता रहता हूँ हर डिब्बा 
और वह निकल जाती है बड़ी तेजी से !!
उसे वक़्त नहीं है मेरे पास बैठने का !
मेरे साथ दो मीठे-मीठे बोल बोलने का !
उसके पास रहते है ढेरो काम !
और मै बैठा रहता ऐसे ही बेकाम ! 
मुझे देख कर बस यू ही मुस्करा देती है ! 
मेरी हर बात को हंसी में टाल जाती है !
और मै खुश हो जाता हूँ, न जाने क्यों,
करने लगता हूँ फिर से इंतजार 
आने वाले पलों की एक नई रेल का...!!

How to Overcome One of Your Greatest Obstacles to Success….?


With the energy and enthusiasm of a teenager, Leena finished her last push up and stood to cheers and applause from the crowd. She smiled humbly and took a well-deserved bow. Shortly to follow was her husband, whose daily routine included 200 sits ups and 100 push ups among a handful of other exercises that would test even the fit of individuals.
After his brief demonstration of youthful strength, Ramesh and his wife turned over to me and started to share their success story.
'I wasn't always in shape,' Ramesh began. 'There was quite a stretch of time when I could barely see my toes, let alone touch them.'
'I remember that,' his wife laughed. 'I wasn't any better.
I was facing some serious health risks and needed to make some major life changes.'
This loving couple worked out every single day smiling through hundreds of push ups and sit ups along with running several miles around their neighborhood.
Nothing that special for someone in their twenties or thirties. Not even that amazing for someone in their forties or fifties.
But when you're 69 or 73 years old, that's simply amazing.
'I started working toward my goal when I was 50,' said Ramesh. 'I only wish I had started sooner.'
His wife agreed. 'You're never too old to start doing what you want to do, but you lose precious time while you wait to begin.'
Absolute wisdom from the lips of a 59 year-old woman whose heart, mind, and body belonged to a much younger girl.
Timing is a central issue when it comes to happiness. While many put their desires off until there is little time left to achieve them, others feel their time has already passed.
 They are trapped by the misconception that goals and dreams are achieved right out of the gates or not at all. They feel locked into a life that is far from what they had planned on creating, with the remainder of their days ripe with regret.
Rawat is another example of an individual following his heart at a later time in life. Until the age of 52, Rawat spent his time selling shake mixers to restaurants around the country. Then he made that life altering trip to Mumbai for a meeting with the Shukla brothers.
At an age when most people feel their best days are behind them he created a restaurant empire that stretched around the India.
For everybody who took a chance at a better life there are ten thousand who let their goals and dreams pass them by. The question is which type of person are we?
Ramesh and Rawat knew what they wanted. They had a clear goal which made it possible for them to achieve great success. The problem is, most people don't know what they want.
We all have goals or ideas of what we'd like to do with our lives, but we all don't achieve them. Many believe the right time passed us by many years ago. This common myth is behind millions of unfulfilled dreams and ambitions.
What can we do to break free from its grip? What is the secret that helped Ramesh and Rawat move past the idea that the 'right time' had passed?
It doesn't matter how young or old we may be, we have right now to begin moving toward our goal. There is only one right time and one wrong time: now and later.
Right this instant. That's the only time we know we have for sure. Make the most of it and do the things we were meant to do. Erase the myth that we're too old and go for it.
While this idea may be enough to get we started down the path toward our goals and dreams, there is a chance we'll need another piece of vital information.

Always remember,” We are never too old to start doing what you want to do, but you lose precious time while you wait to begin.”

एह्सास ....!



(1)


भागता जाता हूँ

भाग रहा हूँ ....

कभी कमाने क़े लिए ...!

कभी पचाने क़े लिए...!!


(2)

भागते चले गए,

आगे बढ़ने की चाह में ....!

पलट कर भी न देखा ,

क्या मिला आये हम खाक में ....!!


(3)

भागते....भागते थक गया

न जाने कैसे खो गया

आँख खुली , कुछ न नज़र आया

साथ छोड़ गया अपना ही साया ...?


Saturday, January 29, 2011

वाह...!!

क्या पूछा-
क्या करता है ये बंदा

कुछ मत पूछो,
अच्छा नहीं ये धंदा !

कई लोगो ने मिलकर
कर दिया इसे गन्दा !

चल रहा है आजकल
बहुत ही मंदा !

बच्चा था, जब
तब माँगा करता था चंदा !

जवानी में पिता की आशाओ
पर फिर कर रंदा..

बंदा, आज भी
माँगा करता है चंदा...!!

Friday, January 28, 2011

फर्क....!!


मनुष्य ने एक बार, 
परेशां हो किया प्रभु से अर्ज....!
मेरे और आपके प्यार में, 
आखिर क्या है फर्क....!!

प्रभु बोले-
जल की मछली मेरा प्यार है !
और प्लेट में रखी  मछली
तुम्हारा प्यार है .....!!

कह अपनी...?


अनबोले तारो सा सब 
छुट जाता !

तुम न देते साथ तो 
ये मन टूट जाता !

मानता हो ;दबा हूँ 
तुम्हारे एहसानों तले !

फिर भी न समझना हमे 
जैसे कुत्ता पले !

मानव, मानव पर एहसान 
नहीं करेगा,
तो क्या वह 
दशमुखी रावण करेगा !

हम न रहे तुम्हारे साथ 
तो क्या हुआ,
हमारा दिल तो सदा 
तुम्हारा ही रहेगा !

अनकहनी...!


जीवन क़े कुछ सच,
बहुत होते है बहुत नग्न..! 
इसीलिए नहीं हुआ जाता
इसमे तल्लीनता से मग्न...!! 
पियूष उघडे हुए माता 
दूध पिलाती जाती है .....
लेकिन 
किस आशा पर ;
यही, न कि
बेटा अंतिम समय 
अवश्य पिलाएगा 
दो बूँद 
पानी क़े......!!


कहते-सुनते अच्छा नहीं है लगता !
फिर भी सच तो आखिर सच होता !!

रवि और कवि.....!



नमस्कार ओ रवि....
तू कौन ?
मै एक कवि !

मै वहा पहुच जाता हूँ 
जहा तुम नहीं पहुच पाते हो !
उसने कहा -
क्यों अपने आप को को बहलाते हो !
व्यर्थ ही ख्वाबी महल बनाते हो !

अरे, तेरी तो गन्दगी में 
जीने की आदत है !
शराफत तुझमे नदारत है !
तू तो है एक निरीह प्राणी !
मेरे सामने तेरी क्या सानी !

अरे जा - कहा राजा भोज 
कहा गंगू तेली !
मत कर मुझसे अठखेली !
किस मूर्ख ने कहा है कि..
जहा न पहुचे रवि 
वहा पहुचे कवि 
अरे मैंने उसे चाय नहीं पिलाई थी !
थोड़ी सी भाँग मांग रहा था ,
वह भी नहीं खिलाई थी !

तूने उसे चाय पिलाई होगी 
भाँग भी खिलाई होगी 
भाँग क़े नशे में वह 
कह गया होगा !
किन्तु मेरा दावा है ...
आज अपने आप पर रो रहा होगा !

स्वर्ग....?



बिदाई की थी अनूठी  घड़ी...!
द्वार पर डोली सजी थी खड़ी !!

माँ की सिसकिया थमने का नाम न ले रही थी !
बिटिया न जाने क्यों  मंद मंद मुसक्या रही थी !!

माँ बोली -
बेटी कभी कोई गलत काम न करना !
मेरे दूध की तुम लाज रखना !!

बिटिया बोली -
माँ, तुम चिंता न करना !
जी अपना हलकान न करना !! 

मै जिस घर में जाउगी
उस घर को स्वर्ग बना दूगी !
जाहिर है कि घर वालो को 
स्वर्गवासी बना दूगी...!!
  

अभिलाषा जीवन की...!



जिन पत्थरो में मैंने खोजे थे कभी देवता,
उन्ही पत्थरो ने किया आज लहूलुहान मुझे...!!

जिन महलों पर राज किये बरसो बड़े शान से,
उन्ही महलों ने बना दिया आज दरबान मुझे !!

निगाहों से निगाहे मिलाकर बाते की थी जिनसे,
उन्ही निगाहों ने कर दिया अब शर्मवान मुझे !!

जिंदगी क़े बरसो वर्ष कर दिए कुर्बान जिन पर,
उन औलादों ने आज बना दिया कूड़ादान मुझे !!

जिन अकेली राहों पर चलता जा रहा हूँ अकेला,
वही राहे कर रही है मजबूत और बलवान मुझे !!

न कभी घबराया और न कभी घबराऊंगा, 
विश्वास है केवल वक़्त बनाएगा कर्मवान मुझे !!

Monday, January 24, 2011

एक और दिन .....!!


लो, आ गया एक और नया दिन 
वह नहीं रहता मेरे सामने हाथ बाँधे... 
वह नहीं खड़ा रहता सिर क़े बल मेरे सामने 
रोज मै ही उसे नमस्कार करता हूँ ! 
उसके हालचाल पूछता हूँ !!
वह दिन भर मेरे सामने खेलता रहता है !
मटर-गश्ती करता रहता है !!
उसे नहीं इंतजार है, मेरे किसी आदेश का 
जानता है दिन भर, उसे करना है केवल आराम !
वह आया है, करने को केवल विश्राम !!
इसी तरह दिन गुजारकर वह चला जायेगा 
और फिर मै लग जाउगा...
एक नए दिन क़े इंतजार में ! 

Sunday, January 23, 2011

शासकीय कर्मचारियों की विशेषताए

 
          (1)


 बने रहो पगला,

 काम करेगा अगला ! 

          (2)

 बने रहो फूल(fool), 


सेलेरी पाओ फुल(Full) !


          (3)

 मत लो टेंशन,

 नहीं तो फॅमिली पायेगी पेंशन !


          (4) 


काम से डरो नहीं,

और काम को करो नहीं !.


          (5)


काम करो या ना करो,


पर काम की फिकर जरुर करो ! ,


और फिकर करो या ना करो,

पर ज़िक्र जरुर करो ...!!



अब कोई क्या करे ....??????

Thursday, January 20, 2011

बहुत दिनों बाद....!!


लुप्त हो गई रौशनी हर तरफ, 
तनिक देर य़ू ही जल क़े !
दिन की पहचान खो गई,
पहुच गए शाम क़े धुधलके !!

कल्पनातीत है यह अपार समुद्र 
नहीं नज़र आता कही किनारा !
खोजता फिरता फिर भी न पाता,
हुआ अब अवगुंठन हमारा !!

हिला डुला इस अन्धकार से,
आ रहे कुछ पदचाप हल्के !
सोचता जो सुख-मुक्ति मार्ग,
नहीं जानता भ्रम मरुपथ क़े !!

Wednesday, January 19, 2011

ज्ञान की देवी

संगमरमरी बाहे उसकी
तन फूलो की ड़ाल !

नैन उसके जादू भरे
मुख चाँदी की थाल !

कुंदन जैसे ओंठ रसिले
रेशम जैसे बाल !

चंदा-सूरज छुप जाय
देख क़े गोरे गाल !

उसके दर्प की माया से
आँखे है लालो-लाल !

बहती नदिया को शर्माए
मस्त पवन की चाल !

सुंदर सुंदर गीत मिलन क़े
मधुर -मधुर सुरताल !

वसंत पग पग नाचे
मौसम खेले हाल !

वह मेरे ज्ञान की देवी
मै उसका महिपाल !

Tuesday, January 18, 2011

समग्र क्रांति

क्रांति की खोज में निकला
     जब अंतिम घुड़सवार भी
          सुविधा का ताबीज बाधंकर
               कुर्सियों क़े जंगल में खो गया
                    मैंने पूछा था नेताजी -


आप की दूसरी आजादी को क्या हो गया था ?
     राजनीति ऑपरेशन टेबल पर पड़ी थी
          दुर्भाग्य की उमर बड़ी थी

फरेबी डॉक्टर
     आश्वासनों क़े इंजेक्शन पर इंजेक्शन लगाये जा रहे थे
          भ्रस्टाचार क़े कैप्सूल पर कैप्सूल खिला रहे थे

देश का भविष्य सो गया था
     और भाई -साब
          आप से क्या बतलाये
               स्वतंत्रता की समग्र क्रांति का
                    एबार्शन हो गया था !